मेजर ध्यानचन्द को हॉकी का जादूगर कहा गया है। यह उनके खेल की तकनीक और अदम्य जोश का परिचायक है। मैदान में जब गेंद ध्यानचन्द के पास आ जाती थी, तो वह दिखती नहीं थी, न ही किसी विपक्षी टीम के खिलाड़ी के पास जाती थी। वह एकमात्र गोलपोस्ट में ही दिखती थी। अनेक बार खेल के पूर्व, मैदान पर उनकी हॉकी बदली गई और उनकी हॉकी खेल के बाद तोड़कर देखी गयी कि इसमें कोई चुम्बक या विशेष तरह का गोंद तो नहीं लगा है।
यह पुस्तक खेलप्रेमियों के लिए जानकारी से भरपूर तो है ही, आधुनिक भारत के खिलाड़ियों के लिए विशेष रूप से पठनीय और प्रेरक भी है।
^ Top