वर्तनी शब्द का अर्थ है – स्पेलिंग। किसी भाषा के अक्षरों को शब्द बनाने में, उनके लिखित शुद्ध अक्षर, मात्रा आदि को हिन्दी में वर्तनी कहा गया है।
हिन्दी भाषा के राष्ट्रव्यापी होने के कारण उसे देवनागरी लिपि में लिखते समय शुद्ध ओर मानक वर्तनी का आवश्यकता पड़ी। 19वीं शती के पूर्व हिन्दी भाषा की कोई मानक वर्तनी नहीं थी। जो जिस भाषा क्षेत्र में निवास करता था, उसी के अनुसार स्थानीय भाषा के शब्दों को ही ‘मानक’मानकर प्रयोग करता था। इससे भाषा में बहुत गड़बड़ी हो रही थी।
इसी गड़बड़ी को दूर करने के लिए अनेक भाषाविदों, विद्वानों, लेखकों व प्रकाशकों का ध्यान गया और सबने अपने–अपने स्तर पर हिन्दी भाषा की मानक वर्तनी स्थिर करने के प्रयास किये, किन्तु आजतक बहुत–सी बातें सर्वमान्य नहीं हो सकी हैं।
प्रस्तुत पुस्तक में पूर्व के विद्वानों का उल्लेख करते हुए, उनके वर्तनी–निर्धारण को उल्लिखित करते हुए, उनसे कुछ ग्रहण करते हुए, कुछ अपनी मान्यता स्थापित करते हुए, हिन्दी भाषा की वर्तनी को एक मानक रूप देने का प्रयास किया गया है. जिज्ञासु पाठकों, विद्यार्थियों, प्रकाशकों, सम्पादकों व विद्वानों के लिए यह एक उपयोगी पुस्तक है।
About the Author(s)
डॉ. सच्चिदानन्द शुक्ल ने गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर से हिन्दी साहित्य में एम.ए., काशी विद्यापीठ, वाराणसी से हिन्दी साहित्य में पी–एच.डी. तथा हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद से संस्कृत विषय में साहित्य रत्न एवं आयुर्वेद रत्न की उपाधियॉं प्राप्त कीं। 1980 से 1986 तक हिन्दी प्रवक्ता के रूप में कार्य किया। तत्पश्चात् 1986 से 1995 तक दैनिक ‘स्वतन्त्र चेतना’ गोरखपुर, दैनिक ‘आज’ बरेली व आगरा तथा दैनिक ‘भास्कर’ झॉंसी व ग्वालियर के सम्पादकीय विभाग में विभिन्न पदों पर कार्य किया। हरिद्वार से प्रकाशित ‘दूधाधारी–वचनामृत’ आध्यात्मिक (मासिक पत्रिका) के सम्पादक के रूप में नौ वर्ष तक कार्य किया। इसके अतिरिक्त हिन्दी पाक्षिक ‘वाग्धारा’ मासिक ‘वन्दना’ व द्विमासिक ‘भाजपुरी सनेस’ व ‘भोजपुरी ऑगन’ का प्रकाशन व सम्पादन किया है। एक हजार से अधिक रचनाएं विभिन्न पत्र–पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं।
‘नाथद्वारा साहित्य मण्डल’ नाथद्वारा चित्तोड़)द्वारा ‘सम्पादक शिरोमणि सम्मान’से सम्मानित। हिन्दी साहित्य व हिन्दूलॉजी विषयक लेखों व पुस्तकों के शोधपरक लेखन में विशेष रुचि।
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