शताब्दियों बाद संस्कृत में प्रो. श्रीकान्त प्रसून विरचित नई स्तुतियों का संग्रह प्रकाशित हुआ है, जिसमें तत्त्व भी है और सत्त्व भी, इसलिए इस संग्रह का नाम ही ‘तत्त्वं सत्त्वम्’ है। यह दो प्रपाठकों में विभाजित है। प्रथम प्रपाठक ‘स्तुति–स्तोत्रम्’में प्रणमामि मात: वीणापाणि, नमामि देवि नमो नम:, देवाधिदेवं नमोस्तुते, वन्दे रासेश्वरम्, वन्दे नित्यं रघुवरम्, गजाननं वन्दे अहम् आदि विभिन्न देवी–देवताओं की स्तुतियॉं एवं प्रार्थनाएं हैं।
दूसरे प्रपाठक ‘जीवनानि चित्राणि’में लभते वरम्, सद्विचार, सफलं जीवनम्, जीवन भास्वरम्, रसहीनं कर्मस्थलम्, संयमं संतुलनम्, व्यथां मूलम्, प्राणा, परितृप्तये आदि जीवन के अनेक चित्र हैं। ये चित्र आधुनिक जीवन को समझने के लिए, जीवों पर और जीवन पर लगातार हो रहे हमलों को जानने के लिए आवश्यक हैं, तथा मनुष्य की और अन्य जीवों की रक्षा के लिए स्तुतियॉं और प्रार्थनाएं जरूरी हैं कि हृदय शुद्ध हो, मन संतुष्ट रहे, तन स्वस्थ्य रहे तथा चेतना बढ़े और सबके अस्तित्व की रक्षा हो सके।
परिवार के सभी सदस्यों के ज्ञान और विकास के लिए, स्तुति–पाठ और दान के लिए, ‘तत्त्व सत्त्वम्’ एक अनुपम कृति है। इसका पाठ करें और दान करें। ज्ञान–दान श्रेष्ठ दान, स्तुतिदान महादान है।
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