गीत और वादन को संगीत कहा जाता है। नृत्य और संगीत मानवजीवन में प्राणरस घोलने के उपादान हैं। भारत में नृत्य और संगीत की परंपरा प्राचीन काल से ही अत्यन्त गौरवशाली रही है। यहां के संगीतज्ञों ने मनुष्य को ही नहीं, जड़ एवं जंगम को भी प्रभावित किया है। इसी परम्परा में उन्नींसवीं सदी के शास्त्रीय व लौकिक नर्तक और संगीतकार भी हैं, जिन्होंने अपनी नृत्य व संगीत कला से मनुष्य और जड़ – जंगम भी प्राणरस और भावों का संचार किया है।
प्रस्तुत पुस्तक में ऐसे ही चुने हुए नर्तकों और संगीतकारों में 21 नर्तकों, 26 गायकों और 25 वादकों की विशेषताओं व उपलब्धियों का वर्णन रोचक तथा ज्ञानवर्धक रूप में किया गया है।
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