Manusmariti

Manusmariti

मनु महाराज हमारे आदि पूर्वज हैं। सृष्टि की उत्पत्ति उन्हीं से मानी जाती है। सभ्य एवं सुसंस्कृत समाज के लिए उन्होंने जो मर्यादाएं निर्धरित की, जो नियम बनाए और जिन विभिन्न प्रकार की नीतियों का प्रतिपादन किया वे ‘मनुस्मृति’ नामक ग्रंथ में संग्रहित हैं। निश्चय ही इन नियमों का परिपालन कर व्यक्तित्त्व का समग्र विकास एवं परमानंदमय जीवन संभव है। बाल्मीकीय रामायण एवं महाभारत में मनुस्मृति को सर्वाध्कि पुरातन एवं प्रामाणिक ग्रंथ स्वीकारा गया है। यह एक ऐसा आदर्श ‘मानव ध्र्मशास्त्रा’ है जिसे विदेशी विद्वानों ने भी समादृत किया है।

जहां तक मनुस्मृति पर उठने वाले आक्षेपों-आरोपों का प्रश्न है, वह कतिपय लोगों द्वारा न्यस्थ स्वार्थ के कारण उसमें छेड़छाड़ करने व उसमें घुसाए गये क्षेपकों के कारण है। ग्रन्थ के सृजन से आज तक अरबों-खरबों वर्ष बीत चुके हैं लिहाजा मूल स्वरूप का विवृफत होना स्वाभाविक है। प्रस्तुत पुस्तक में, गहन अध्ययन-अन्वेषण उपरांत क्षेपकों को हटाकर मूल तथ्यों को आपके समक्ष प्रस्तुत करने का भागीरथ यत्न किया गया है। मनुस्मृति पर अनेक विद्वानों के संस्कृत भाष्य, टीकाएं © एवं अनुवाद उपलब्ध् हैं, लेकिन सरल, सटीक और व्याख्यात्मक विवेचन का अभाव है। इस पुस्तक में इस अभाव को भी दूर करके, मनु महाराज के वचनों का ‘व्यवहारिक पक्ष’ सरल भाषा व रोचक शैली में आपके समक्ष रखा गया है।



वैज्ञानिक, दार्शनिक, चिन्तक एवं तत्त्वज्ञ डाॅ. राजाराम गुप्ता का जन्म 6 मार्च सन् 1937 को झाँसी जिले के एक छोटे से गाँव बरौदा डाँग में हुआ था। वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के छात्रा रहे।

डाॅ. गुप्ता होल्कर साइंस काॅलेज, इन्दौर में रसायन शास्त्रा के प्राध्यापक रहे। आपके निर्देशन में पाँच शोधर्थी पी.एच.डी. की उपाधि प्राप्त कर चुके हैं। वे देवी अहिल्या वि.वि., इन्दौर की महासभा ;सीनेटद्ध के निर्वाचित सदस्य भी रहे हैं।

डाॅ. गुप्ता निवर्तमान शंकराचार्य पूज्य स्वामी सत्यमित्रानन्दजी ;संस्थापक भारत माता मंदिर, हरिद्वारद्ध के शिष्य हैं। ‘गीता’, ‘मानस’ सहित विविध् आध्यात्मिक एवं सामाजिक विषयों पर उनकी छः कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं। देश की प्रतिष्ठित पत्रा-पत्रिकाओं में उनके अनेक आलेख प्रकाशित हुए हैं। अगस्त, 2012 में फ्श्रीमद् भागवत्य् पर उनकी एक कृति ‘जीवन संजीवनी’ ;कोड 1927द्ध शीर्षक से गीता पे्रस, गोरखपुर से भी प्रकाशित हुई है।


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